क्या होता अगर —
BJP: 207 सीटें
TMC: 80 सीटें
ना होकर आज —
TMC: 207 सीटें
BJP: 80 सीटें
और बीजेपी की जगह TMC ये इलेक्शन जीत जाती ???
कल्पना कीजिए... अगर नतीजे उल्टे होते तो? तो आज देश का राजनीतिक मौसम कैसा होता?
शायद वही टीवी स्टूडियो, वही चमचमाती स्क्रीनें, वही चुनावी विशेषज्ञ, वही राजनीतिक ज्योतिषी और वही राष्ट्रव्यापी बहसें...
बस सुर बदल गए होते।
जो आज "परिवर्तन की लहर" का गुणगान कर रहे हैं, वे शायद आज यह समझा रहे होते कि—
"दीदी आज भारतीय राजनीति की चाणक्य बनकर उभरी हैं।"
"क्या वे राष्ट्रीय राजनीति का अगला सबसे बड़ा चेहरा हैं?"
"क्या प्रधानमंत्री पद के लिए वे सबसे मजबूत दावेदार हैं?"
"उनकी रणनीति पर दुनिया के विश्वविद्यालय शोध करेंगे।"
"विपक्ष में उनके जैसा दूरदर्शी नेता कोई नहीं।"
फिर मंत्रिमंडल की संभावनाओं पर चर्चा होती।
कौन मंत्री बनेगा?
किसे कौन विभाग मिलेगा?
कौन उत्तराधिकारी होगा?
कौन नया सितारा बनकर उभरेगा?
और उनकी प्रशंसा में इतने कसीदे गढ़े जाते कि उन्हें गिन पाना भी मुश्किल हो जाता।
क्योंकि हमारे देश में चुनाव परिणाम सिर्फ सरकारें नहीं बदलते...
वे विश्लेषण बदलते हैं।
वे विचार बदलते हैं।
वे सिद्धांत बदलते हैं।
और कई बार तो विशेषज्ञों की भविष्यवाणियाँ भी बदल देते हैं।
और सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न "जनता का क्या?"
Winning Is Everything
क्योंकि हमारे यहाँ अक्सर विचार नहीं जीतते...
जीत ही विचार बन जाती है।
जो जीत गया वही दूरदर्शी।
जो जीत गया वही रणनीतिकार।
जो जीत गया वही जननायक।
और जो हार गया...
उसकी विचारधारा, उसके सिद्धांत, उसकी उपलब्धियाँ और उसके समर्थकों की भावनाएँ भी अचानक विश्लेषण के हाशिए पर चली जाती हैं।
यही नहीं...
सबसे तेज़ बनने की होड़ में शायद कई न्यूज़ चैनलों ने तो TMC की ऐतिहासिक जीत की बाइट्स, डिबेट्स और स्पेशल शो भी पहले से तैयार कर रखे होंगे।
कुछ एंकर शायद यह पूछने की तैयारी में रहे होंगे—
"क्या ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा हैं?"
"क्या प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष की सबसे मजबूत दावेदार अब दीदी हैं?"
"क्या यह भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है?"
और कुछ राजनीतिक विश्लेषक शायद यह समझाने में व्यस्त होते कि—
"यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं है, यह एक वैचारिक क्रांति है।"
क्योंकि हमारे देश में कई बार चुनाव परिणाम सिर्फ सरकारें नहीं बदलते...
वे विश्लेषण बदलते हैं।
वे सिद्धांत बदलते हैं।
वे भविष्यवाणियाँ बदलते हैं।
और कभी-कभी तो विशेषज्ञ भी परिणाम आने के बाद इतने आत्मविश्वास से कारण बताते हैं कि लगता है जैसे उन्हें सब पहले से ही पता था।
चुनाव कौन जीतता है?
यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं है।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है—
चुनाव के बाद कहानी कौन लिखता है?
क्योंकि इतिहास अक्सर विजेता लिखता है।
मीडिया उसे सजाकर बेचता है।
विशेषज्ञ उसे समझाकर बेचते हैं।
और हम सब मिलकर उसे खरीद लेते हैं।
विकास कहाँ है?
अजीब बात है।
हर तरफ चुनाव दिखता है।
पार्टी दिखती है।
जाति दिखती है।
धर्म दिखता है।
मेरा-तेरा दिखता है।
लेकिन इनके बीच...
एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ दिखाई देता है—
विकास।
और उसके बगल में बैठा होता है—
वो राज्य।
दोनों ऐसे जैसे किसी मेले में खो गए हों।
और बाकी सब अपनी-अपनी दुकानें चला रहे हों।
जहाँ हम नागरिक नहीं रह जाते...
बल्कि उत्पाद (Product) बन जाते हैं।
और धीरे-धीरे...
एक राज्य एक लोकतांत्रिक राज्य कम और एक निजी दुकान ज़्यादा दिखाई देने लगता है।
बंगाल की कहानी या सत्ता की कहानी?
बंगाल की कहानी किसी एक पार्टी की कहानी नहीं है।
यह सत्ता की कहानी है।
यह एक खास तरह की सोच की कहानी है: कोई भी व्यक्ति, पार्टी या विचारधारा जो लंबे समय तक सत्ता में रहती है, धीरे-धीरे यह मानने लगती है कि वे राज करने के लिए ही पैदा हुए हैं। वे उन लोगों का दमन करने लगते हैं जो उनका समर्थन नहीं करते; नतीजतन, सत्ता असामाजिक तथा आपराधिक तत्वों के हाथों में चली जाती है। ऐसा सिर्फ़ सत्ता की चाहत में नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उन्हें उनकी असल काबिलियत से कहीं ज़्यादा मिल चुका होता है...
जहाँ भी अराजकता और असामाजिक तत्वों का बोलबाला होता है, वहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता किसी सच्चे काबिल नेता के बजाय किसी मौकापरस्त के हाथों में चली गई है। और जब ऐसा होता है, तो सत्ताधारी पक्ष अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है...
लेकिन प्रकृति का नियम किसी दल के घोषणा-पत्र से नहीं चलता।
किसी ने कहा – "दीदी आप ये इलेक्शन हारी नहीं हैं"
और बात बिलकुल सही भी है कि ममता दीदी ये इलेक्शन हारी नहीं हैं, बल्कि यह परिणाम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों, किए गए कार्यों और वर्षों में बनी राजनीतिक धारणाओं का स्वाभाविक फल है।"
सबसे बड़ा भ्रम
राजनीति की सबसे खतरनाक बीमारी है—
अजेय होने का भ्रम।
जब कोई दल, कोई नेता, कोई विचारधारा या कोई देश यह मान लेता है कि अब उसे कोई हिला नहीं सकता...
उसी दिन उसका पतन शुरू हो जाता है।
सबसे बड़ी त्रासदी तब शुरू होती है जब आदमी बड़ा होने के बाद स्वयं को ईश्वर और लोगों का भाग्य निर्माता मान लेता है...
तो समझ लीजिए यही से पतन की शुरुआत हो चुकी है।
और फिर सब उससे दूरियाँ बना लेते हैं।
सबसे पहले उसके अपने ही...
क्योंकि सम्मान खरीदा नहीं जा सकता।
और भय से खड़े लोग,
भय समाप्त होते ही चले जाते हैं।
यही परिणाम अंततः घटित होना है।
एक सार्वभौमिक नियम
यह नियम केवल बंगाल पर लागू नहीं होता।
यह हर जगह लागू होता है।
सत्ता पर भी।
विपक्ष पर भी।
व्यक्ति पर भी।
राष्ट्र पर भी।
जो आज छोटा है,
वह कल बड़ा हो सकता है।
लेकिन जो आज बड़ा है,
वह हमेशा बड़ा ही रहेगा—
यह संभव नहीं है।
और यहीं सबसे बड़ी भूल होती है।
जब मनुष्य सफलता के बाद स्वयं को अपरिहार्य समझने लगता है।
धीरे-धीरे वह जनता से दूर हो जाता है।
और अंततः वास्तविकता से भी।
वक्त अवसर देता है
वक्त बड़ा न्यायप्रिय है।
वह अवसर देता है।
मंच देता है।
शक्ति देता है।
पद देता है।
सम्मान देता है।
लेकिन वह यह भी देखता है कि उस शक्ति का उपयोग किसलिए किया गया।
यदि उस शक्ति से लोगों का भला हुआ—
तो वक्त और अवसर देता है।
यदि उस शक्ति का उपयोग केवल अपने लिए हुआ—
तो वक्त इंतज़ार करता है।
और फिर एक दिन हिसाब करता है।
क्योंकि...
"वक्त की एक आदत है कि वो वक्त पर बदलता ज़रूर है।"
और जब बदलता है...
तो वही लौटाता है जो बोया गया था।
अंतिम बात...
अगर आप सिर्फ मनोरंजन चाहते हैं, तो निश्चिंत रहिए...
मनोरंजन करने वालों ने सब कुछ कमा लिया है।
धन भी।
दौलत भी।
पद भी।
प्रतिष्ठा भी।
इतना कि कई आने वाले चुनावों की व्यवस्था भी आराम से हो जाए।
आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित हो जाए।
पार्टी फंड भी भर जाए।
और यह सिलसिला आगे भी चलता रहे।
लेकिन इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा निवेशक कौन है?
आम जनता।
और सबसे बड़ा भुगतान भी वही करती है।
कभी टैक्स के रूप में।
कभी महंगाई के रूप में।
कभी बेरोजगारी के रूप में।
कभी टूटे हुए वादों के रूप में।
फिर भी वह उम्मीद नहीं छोड़ती।
उसे आज भी लगता है कि शायद कल कोई आएगा...
जो उसके मुद्दों की बात करेगा।
जो भ्रष्टाचार जैसे सबसे बड़े रोग से मुक्ति दिलाएगा।
जो सत्ता को साधन समझेगा, साध्य नहीं।
और इसी उम्मीद में...
जब उसे दूर कहीं आशा की एक छोटी-सी किरण दिखाई देती है,
"वह उसके साथ चल पड़ती है।"
क्योंकि जनता अक्सर चेहरे नहीं चुनती,
वह उम्मीद चुनती है।
और उम्मीद की भूख इतनी बड़ी होती है कि उसे जहाँ एक चिंगारी दिखाई देती है, वह उसके पीछे चल पड़ती है—
चाहे वह "मशाल" निकले,
"दीमक" निकले,
या फिर एक "कॉकरोच" ही क्यों न निकले।
क्योंकि उसे व्यक्ति नहीं,
संभावना दिखाई देती है।
उसे नेता नहीं,
भविष्य दिखाई देता है।
और जब वक्त बदलता है,
तो सिर्फ सरकारें नहीं बदलतीं...
कहानियाँ बदलती हैं,
नायक बदलते हैं,
विचार बदलते हैं,
और कभी-कभी तो पूरा इतिहास ही बदल जाता है।
इसलिए जीत का अहंकार मत पालिए...
और हार से निराश मत होइए...
क्योंकि अंतिम निर्णय किसी पार्टी का नहीं,
किसी नेता का नहीं,
किसी विचारधारा का भी नहीं—
अंतिम निर्णय हमेशा वक्त का होता है।
"और लम्बे समय तक वक्त उसका नहीं होता, जो 'वक्त के' साथ चलता है, बल्कि लम्बे समय तक वक्त उसका होता है, जो 'वक्त पर' साथ चलता है…"
बंगाल-अ-देश
• क्यों विदेशी ताकतें अपने पार्लियामेंट में किसी दूसरी पार्टी के सत्ता में आने से बेचैन हो उठी थीं?
• क्या बंगाल को एक अलग देश बनाने की तैयारी चल रही थी?
• क्या ममता बनर्जी एक स्व घोषित देश की पी एम् बनने का सपना देखने लगी थीं?
• अभी बहुत से सच उजागर होने बाकी हैं... यक़ीनन वो सच कहीं ज़्यादा भयावह होंगे...
बंगाल केवल एक राज्य नहीं।
एक चेतावनी भी है।
एक दर्पण भी।
एक स्मरण भी।
यह याद दिलाता है कि—
कोई भी सत्ता स्थायी नहीं।
कोई भी विचार अंतिम नहीं।
कोई भी विजय शाश्वत नहीं।
और कोई पराजय अंतिम भी नहीं।
और कोई भी "सेवक" "शासक" नहीं...