किसी भी राष्ट्र की असली शक्ति उसकी संसद नहीं, उसकी मेधा (Talent) होती है।
लेकिन आज भारत के सामने एक ऐसा यक्ष प्रश्न खड़ा है—
अगर युवाओं के सपने ही हर बार प्रशासनिक मेजों पर 'लीक' होने लगें, तो भविष्य का निर्माण कौन करेगा?
जब मेहनत करने वाले छात्र की आँखों में भविष्य के बजाय धुंध छाने लगे, तो व्यवस्था के अंधेरे कोनों में एक खामोश आक्रोश जन्म लेता है। यह वह राजनीति नहीं है जो झंडे लेकर चलती है; यह वह सड़ांध है जो व्यवस्था की कमजोरियों को 'कॉकरोच' की तरह अपना घर बना लेती है।
1. चुनावी मास्टरस्ट्रोक बनाम प्रशासनिक उदासीनता: एक विरोधाभास
वर्तमान सत्ताधारी दल की कार्यप्रणाली आज दुनिया भर के लिए शोध (Research) का विषय है। चाहे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हो या चुनावी बिसात बिछाना—उनकी प्लानिंग इतनी सटीक और 'अमेजिंग' होती है कि विरोधी भी दंग रह जाते हैं। आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह रिसर्च का विषय होगा कि कोई राजनीतिक दल इतना 'मास्टर प्लानर' कैसे हो सकता है।
लेकिन यहीं पर एक बड़ा 'परन्तु' (But) खड़ा होता है।
जो पार्टी हर छोटे-बड़े चुनावी मुद्दे को सूक्ष्मता (Micro-planning) से हल कर लेती है, वह पेपर लीक और छात्र हितों जैसे गंभीर मुद्दों पर इतनी उदासीन क्यों है? जो ऊर्जा और फोकस चुनावों को जीतने में लगाया जाता है, वही फोकस परीक्षा प्रणालियों को 'लीक-प्रूफ' बनाने में क्यों गायब दिखता है? यह उदासीनता केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चूक भी है।
2. मौकापरस्त ताकतों का खेल
अगर मुख्यधारा की सत्ता इन बुनियादी मुद्दों को हल करने में विफल रहती है, तो मैदान खाली नहीं रहता। अन्य 'मौकापरस्त' (Opportunistic) ताकतें इस खालीपन का फायदा उठाती हैं। वे छात्रों के जायज गुस्से को अपने एजेंडे की आग में झोंक देती हैं।
अंततः, इस राजनीतिक खींचतान में नुकसान केवल छात्र का होता है। नेताओं की रैलियाँ राजधानी से उन राज्यों की ओर मुड़ जाती हैं जहाँ चुनाव नजदीक होते हैं, लेकिन उस छात्र का क्या जिसका कीमती समय और सुनहरा भविष्य हमेशा के लिए राख हो गया? चुनावी रैलियाँ आती-जाती रहेंगी, लेकिन खोया हुआ साल कभी वापस नहीं आता।
3. न्यायपालिका का हंटर: यह केवल 'मिसमैनेजमेंट' नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया टिप्पणियों में साफ़ किया है कि परीक्षाओं की शुचिता (Sanctity) से समझौता पूरे देश की साख से खिलवाड़ है। कोर्ट ने बार-बार चेतावनी दी है कि परीक्षा प्रणाली में .001% की खामी भी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। जब देश की सबसे बड़ी अदालत व्यवस्था के प्रति अविश्वास जताने लगे, तो समझ जाइये कि पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है।
4. उम्मीद "कॉकरोच" से ही क्यों?
यहीं पर आकर समझ आता है कि हमारी जनता और युवा कितने लाचार हैं।
आज भी इस देश के नागरिक को लगता है कि शायद कल कोई आएगा...
• जो उसके असली मुद्दों की बात करेगा।
• जो भ्रष्टाचार जैसे सबसे बड़े रोग से इस व्यवस्था को मुक्ति दिलाएगा।
• जो सत्ता को जनता की सेवा का 'साधन' समझेगा, अपनी भूख मिटाने का 'साध्य' नहीं।
और इसी अंतहीन उम्मीद में... जब उसे दूर कहीं, धुंध के पार आशा की एक छोटी-सी किरण भी दिखाई देती है, "वह उसके साथ चल पड़ती है।"
क्योंकि जनता अक्सर चेहरे नहीं चुनती, वह उम्मीद चुनती है। और उम्मीद की भूख इतनी बड़ी होती है कि उसे जहाँ एक चिंगारी दिखाई देती है, वह उसके पीछे चल पड़ती है—
"चाहे वह फिर एक 'कॉकरोच' ही क्यों न हो!"
क्योंकि उसे व्यक्ति नहीं, संभावना दिखाई देती है। उसे नेता नहीं, अपना भविष्य दिखाई देता है। यह हमारी जनता की सबसे बड़ी ताकत भी है, और सबसे बड़ी त्रासदी भी।
5. सबसे बड़ा प्रश्न: मेधा या सड़ांध?
यदि देश का मेधावी युवा अपनी मेहनत से भरोसा खो देगा, तो कल योग्य डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक कहाँ से आएंगे? यदि कल आपका इलाज करने वाला डॉक्टर अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि पेपर खरीदकर आया हो, तो क्या आप अपनी जिंदगी उसके हाथ में सौंपेंगे?
अगर जवाब 'नहीं' है, तो फिर इस 'कॉकरोच मानसिकता' को सहना बंद करना होगा। अन्यथा, 'प्रतिभाओं की संसद' तो हम पहले ही खो चुके होंगे, फिर इस देश को चलाने के लिए केवल अंधकार के जीवों का समूह ही बचेगा।
अंतिम विचार
सरकारें आएँगी और जाएँगी, चुनावी एजेंडे गढ़े जाएँगे। लेकिन एक बात इस देश के मास्टर प्लानर्स को याद रखनी चाहिए—जिस दिन देश के युवाओं का अपनी मेहनत से विश्वास टूट गया, उस दिन कोई 'भूमिगत क्रांति' नहीं होगी... उस दिन "भूमिगत निराशा" का ऐसा दौर शुरू होगा जो पूरी व्यवस्था को खोखला कर देगा।
वक्त है कि मास्टर प्लानिंग केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं, बल्कि सपनों को सुरक्षित करने के लिए भी की जाए।